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शिक्षा दर्शन- 35 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 11

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 11
व्यक्तित्व

व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास शिक्षा और मनोविज्ञान का मूल विषय है। आधुनिक मनोविज्ञान में व्यक्तित्व के अध्ययन को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। किंतु व्यक्तित्व को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करने वाली परिभाषा आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के द्वारा इसके अध्ययन के प्रति जागरूक रहते हुए भी अभी तक नहीं दी जा सकी है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक में प्रोफ़ेसर अलपोर्ट ने व्यक्तित्व की जो परिभाषा दी है। वह अधिक मान्य है। इनके अनुसार व्यक्तित्व व्यक्ति की उन मनो शारीरिक पद्धतियों का वह आंतरिक गत्यात्मक संगठन है जो कि पर्यावरण में उसके अनन्य समायोजन को निर्धारित करता है। आधुनिक मनोविज्ञान व्यक्तित्व को केवल शरीर और मन का योग मान्यता है। भारतीय दर्शन में व्यक्ति के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आत्मा का उल्लेख किया गया है। मनुष्य ना केवल शरीर है बल्कि उसके भीतर एक ऐसी प्राण शक्ति है जो आध्यात्मिक रूप रखती है। दूसरे शब्दों में, मानव शरीर और आत्मा का एक समग्र पुंज है मनुष्य के केवल शारीरिक, बौद्धिक अथवा भावात्मक व्यवहारों से उसके व्यक्तित्व का सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

शिक्षा दर्शन- 34 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 9

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 9
एकाग्रता

ज्ञान की प्राप्ति के लिए केवल एक ही मार्ग है और वह है एकाग्रता। मन की एकाग्रता ही संपूर्ण शिक्षा का सार है। एकाग्रता की शक्ति जितनी अधिक होगी ज्ञान की प्राप्ति भी उतनी ही अधिक होगी। एक ही विषय पर ध्यान देने का नाम है। एकाग्रता मन में सदैव संकल्प विकल्प पानी की लहरों के समान उत्पन्न होते रहते हैं। मन या चित्त्त अति चंचल होता है निरंतर वाह्य विषयों मैं प्रवृत्त होता रहता है। ऐसा चित्त्त शांत और स्थिर बना रहता है। चित्त्त की इस बिखरी हुई शक्ति से कोई कार्य संपादित नहीं होता। प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने चित्तवृत्ति निरोध का शिक्षा का लक्ष्य माना। वास्तव में चित्त्त ही शिक्षा का वाहन है। राजयोग में धारणा , ध्यान और समाधि एकाग्रता के ही निर्मित स्थल हैं। समाधि पूर्ण एकाग्रता की स्थिति है , जहां ज्ञान स्वरूप आत्मा का दर्शन होकर विषय का यथार्थ ज्ञान होता है। व्यक्ति अपनी मूल प्रकृति आध्यात्मिकता से जुड़ जाता है । और ज्ञान का उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता है । चरम विवेक सत्य का अन्तर्भासात्मक दर्शन, वाणी जो प्राप्त पूर्ण अंतः प्रेरणा ज्ञान का ऐसा प्रत्यक्ष दर्शन है, जो प्रायः अंतः प्रकाश तक पहुंच जाता है। और मनुष्य सत्य का द्रष्टा बन जाता है।

शिक्षा दर्शन- 33 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 8

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 9
शिक्षा के भारतीय मनोवैज्ञानिक आधार

शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय विचारधारा और संस्कृति की विषय सामग्री को सम्मिलित कर देने मात्र से कोई शिक्षा भारतीय नहीं बन जाती। हमें भारत की उन मनोवैज्ञानिक पद्धतियों पद्धतियों की खोज करनी होगी, जो मनुष्य की उन नैसर्गिक शक्तियों एवं उपकरणों को सजीव बना देती है। जिनके द्वारा वह ज्ञान को आत्मसात करता है ,नवीन नवीन सृष्टि कर्ता है तथा मेधा पौरूष और ऋतंभरा प्रज्ञा का विकास करता है। उस विपुल बौद्धिकता आध्यात्मिकता और अति मानवीय नैतिक शक्ति का रहस्य क्या था ? जिसे हम वेद ,उपनिषद, रामायण ,महाभारत, प्राचीन दर्शन शास्त्रों में भारत के सर्वोत्कृष्ट काव्य, कला, शिल्प और स्थापत्य में स्पंदित होते हुए देखते हैं ? हमें भारत के आत्मा आदर्शों और उन पद्धतियों को अधिक प्रभावशाली और आधुनिकतम संगठन के रूप में जीवित करना होगा जिनके आधार पर विकसित शिक्षा ही भारतीय शिक्षा होगी। इस दृष्टि से यहां हम शिक्षा के भारतीय मनोविज्ञान आधारों की संक्षेप में संक्षेप में चर्चा कर रहे हैं।

शिक्षा दर्शन- 32 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 7

शिक्षा दर्शन- 32 
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 7 
शिक्षा दर्शन के द्वारा शिक्षा की दिशा निर्धारित होती है ।
शिक्षा के लक्ष्य तथा शिक्षा के विभिन्न पक्षों का स्वरूप क्या
हो या शिक्षा दर्शन निश्चित करता है। किंतु शिक्षा के लक्ष्य
कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं अथवा शिक्षा की पद्धति क्या है ,
यह मनोविज्ञान के द्वारा निर्धारित होता है । अतः शिक्षा का

मनोविज्ञान से घनिष्ठ संबंध माना गया है । शिक्षा मानव
विकास की प्रक्रिया है । मनोविज्ञान मानव प्रकृति का
अध्ययन करता है । मनस तत्व की व्याख्या करता है प्रकृति
एवं मानस विकास के अभिकरण हैं हैं। मनोविज्ञान शिक्षा की
प्रक्रिया में सहायक होता है। इसी कारण शिक्षा मनोविज्ञान
का विकास स्वतंत्र विषय के रूप में हुआ है । मनोविज्ञान का
शाब्दिक अर्थ मन का विज्ञान है साइकोलॉजी शब्द का अर्थ
आत्मा का विज्ञान है ।

शिक्षा दर्शन- 31 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 6

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 31
पुरुषार्थ चतुष्टय
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आजकल भ्रम बस धर्म को अंग्रेजी भाषा अंग्रेजी भाषा के शब्द रिलीजन के अर्थ में समझा जाने लगा है । भारतीय दर्शन में धर्म शब्द व्यापक अर्थ का प्रयोग किया जाता है। इसका पर्यायवाची शब्द किसी अन्य भाषा में उपलब्ध नहीं है। रिलीजन शब्द को भारतीय विचार के अनुसार उपासना पंथ के समकक्ष माना जा सकता है। अतः धर्म शब्द को समझना आवश्यक है इसके अर्थ को ठीक प्रकार से ना समझ कर रिलीजन के अनुवाद के रूप में इसका प्रयोग किया जा रहा है।

शिक्षा दर्शन- 30 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 5

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 30
सृष्टि की सोद्देश्यता एवं परस्पर पूरक व्यवस्था
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भारतीय दार्शनिक एवं विचारक सृष्टि की उत्पत्ति परम चेतन तत्व चेतन तत्व ब्रह्मा से मानते हैं । तथा चराचर सृष्टि उस उद्गम में मिलने के लिए प्रयत्नशील है। इसीलिए इससे सृष्टि चक्र कहा है । श्री अरविंद के अनुसार जल तत्व में प्राण और प्राण में जीव तथा जीभ में मानस का अवतरण घटना मात्र नहीं है ,बल्कि उसके पीछे दैवीय प्रकृति का एक आयोजित उद्देश्य है।

शिक्षा दर्शन- 29 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 4

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 29
भारतीय शिक्षा के दार्शनिक आधार
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शिक्षा जीवन के विकास की प्रक्रिया है वह जीवन की साधना है जीवन का साक्षात स्वरूप है । व्यक्ति और समाज के जीवन में जो कुछ विकास हुआ है वह शिक्षा के द्वारा ही हुआ है । सभ्यता और संस्कृति के विकास के पीछे शिक्षा की प्रेरणा रही है , वास्तव में शिक्षा जीवन के विकास का पर्याय है। राष्ट्र जीवन के मूल्य एवं आदर्श ही शिक्षा के मूल्य एवं आदर्श होते हैं प्राचीन और महान संस्कृति के उत्तराधिकारी भारत में अनुभव की एक लंबी यात्रा के पश्चात जीवन के आधारभूत सत्यों का आविष्कार हुआ ।

शिक्षा दर्शन- 28 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 3

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 28
शिक्षा में प्रयोजनवाद
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आदर्शवाद और प्रकृतिवाद के मध्यम मार्ग के रूप में शिक्षा का नवीन सिद्धांत प्रतिपादित हुआ जिसका नाम प्रयोजनवाद या फलवाद रखा गया। इस दार्शनिक सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्तक विलियम जेम्स ने भी इसे आदर्शवाद और प्रकृतिवाद का मध्यम मार्ग माना है। इस दार्शनिक सिद्धांत के अन्य समर्थकों में शिलर और जॉन दुई अधिक प्रसिद्ध हुए, यह सिद्धांत वास्तव में अमरीकी दार्शनिक सिद्धांत है। यूरोप के अनेक देशों के लोग अमेरिका में जाकर बसे इन विविधता पूर्ण प्रवासियों का कोई अपना दार्शनिक मत या सिद्धांत नहीं था।

शिक्षा दर्शन- 27 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 2

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 27
प्राचीन भारतीय शिक्षा का दर्शन
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प्राचीन भारत का शिक्षा दर्शन आदर्शवादी शिक्षा दर्शन माना जाता है किंतु आदर्शवाद के सिद्धांत को जो स्वरूप यूरोप में प्रचलित हुआ उससे भारतीय आदर्श वाद का सिद्धांत पूर्णता भिन्न है. भारतीय शिक्षा का आदर्शवाद छात्र को केवल किसी विशेष सिद्धांत के अनुसार शिक्षा देना मात्र ही पर्याप्त नहीं समझता था !

शिक्षा दर्शन- 26 भारतीय शिक्षा के मूल तत्व 1

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 26
शिक्षा और दर्शन
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भारतीय व्यवस्था के अनुसार “दृश्यते यथार्थतत्तवमनेन’’ - जिसके द्वारा यथार्थ तत्व या स्वरूप का ज्ञान होता होता है, उसे दर्शन कहते हैं। जाॅन ड्यूई ने दर्शन की व्याख्या करते हुये कहा है कि ’’जब जानबूझ कर नियमित ढंग से किसी विषय के सब पक्षों के सम्बन्ध में सचेतन की समीक्षात्मक प्रक्रिया होती है। वही दर्शन है। विश्व में जितनी भी मानव प्रवृतियाँ हैं उनका आधार कोई न कोई दार्शिनिक सिद्धांत है।जिसमें सार्वभौम सैद्धांतिक आधार पर किसी कार्य के उद्देश्य पद्धति, प्रणाली, कार्यक्रम आदि का संयोजन होता है। उस आधार को ही दर्शन कहा जाता है।

शिक्षा दर्शन- 25 शिशु मंदिर की रीती निति

विद्याभारती E पाठशाला
भारतीय शिक्षा के मूल तत्व - 25
शिक्षा का अर्थ

शिक्षा मनुष्य - जीवन के परिष्कार एवं विकास की प्रणाली है । जीवन के प्रत्येक अनुभव को शिक्षा कहा जा सकता है । वास्तव में समस्त मानव - जीवन ही शिक्षा है और शिक्षा ही जीवन है । जो कुछ भी व्यवहार मनुष्य के ज्ञान की परिधि को विस्तृत करे , उसकी अन्तदृष्टि को गहरा करे , उसकी प्रतिक्रियाओं का परिष्कार करे भावनाओं और क्रियाओं को उत्तेजित करे अथवा किसी न किसी रूप में उस को प्रभावित करे वह ' शिक्षा ' ही है ।

शिक्षा दर्शन- 24 विद्यालय की प्रतिष्ठा

विद्याभारती E पाठशाला
Lesson – 24 (शिक्षा शिक्षण)
क्या-क्या ज़रूरी है एक कक्षा में?

आमतौर पर किसी कक्षा में श्यामपट के अलावा बस कुछ पुराने धूल-धूसरित चार्ट ही देखने को मिलते हैं। लेखिका ने अपने अनुभवों के आधार पर विस्तार से दर्शाने का प्रयास किया है कि एक कक्षा के अंदर कितना कुछ संभव है अगर हम थोड़ा-सा खुलकर सोचें और थोड़ी-सी ज़हमत उठाएं।

शिक्षा दर्शन- 23 आदर्ष विद्यालय कार्य

विद्याभारती E पाठशाला
Lesson –23 (शिक्षा शिक्षण)
कक्षा प्रबंधन

कक्षा प्रबंधन करना शिक्षक के लिए चुनौती भरा कार्य है।
शिक्षक का प्राथमिक उद्देश्य विद्यार्थी का पूर्ण विकास
करना है। पूर्ण विकास करना तभी संभव है जब शिक्षक
अपने प्रबंधन से विद्यार्थी का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित
कर सकेगा।