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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये
1- E पाठशाला का पूर्ण अवकाश
E पाठशाला के सभी बंधुओं को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये..
आप सभी आनंद से नव वर्ष का स्वागत करें..
आज और कल E पाठशाला का पूर्ण अवकाश रहेगा..
संघ के संस्थापक पूज्य डॉ. हेडगेवार जी जिनका आज के दिन जन्मदिवस है. उनकी जीवनी का अध्ययन अवश्य कीजिये..

2- प्रेक्टिकल--- आप इस दो दिवसीय अवकाश का उपयोग विज्ञान के लेसन प्लान बनाने में कीजिये. आपको विज्ञान के अभी तक संपन्न पाठ में से कोई एक पाठ का लेसन पालन बनाना है. इस लेसन प्लान को अपनी कॉपी पर बनाकर मोबाइल से फोटो खीच कर whatapp 9424426409 पर भेजना है.अथवा इस क्लास रूम में attach करना है..इस लेसन प्लान के आपको 10 अंक आपकी अंतिम परीक्षा में प्राप्त होंगे. (अंक-10)
लेसन प्लान का प्रारूप नीचे दिया जा रहा है...

डॉ हेडगेवार जीवनी
पाठ योजना 1
पाठ योजना 2

राकेश शर्मा
विद्याभारती@ict

शिक्षण कौशल - विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण

शिक्षण कौशल - विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण
शिक्षण कौशल - विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण (साप्ताहिक पाठ)
विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण कैसा हो. प्रधानाचार्य एवं आचार्य इस में क्या भूमिका निभा सकते है..
इस विषय पर आज शिक्षण कौशल का पाठ है..
अध्ययन का अपने विद्यालय में कोई इस विषय में कार्य चल रहा हो तो कमेंट्स बॉक्स में अवश्य लिखिए.

शिक्षण कौशल - विद्यालय का संस्कारक्षम वातावरण pdf 



बालिका शिक्षा

शिक्षण कौशल - बालिका शिक्षा (साप्ताहिक पाठ)
1-बालिका शिक्षा
शिक्षा हर मनुष्य के लिए अत्यन्त अनिवार्य घटक है। बिना शिक्षा के मनुष्य को पशु की श्रेणी में रखा जाता है। शिक्षा की जब बात आती है तो आज भी ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जिससे शिक्षा में असमानता मिल जाएगी। प्राचीन काल में नारी शिक्षा अथवा बालिका शिक्षा का विशेष प्रबंध था, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व तक बालिका शिक्षा की स्थिति अत्यन्त सोचनीय थी।

2-विद्या भारती की बालिका शिक्षा का स्वरुप क्या है



शिक्षण कौशल - पंचमुखी शिक्षा (साप्ताहिक पाठ)

 पंचमुखी शिक्षा 
विद्याभारती ने बालकों के सर्वागीण विकास को ध्यान में रख कर शिक्षा देने की दृष्टि से एक विशिष्ठ शिक्षा योजना का निर्माण किया गया है। यह शिक्षा योजना पंचमुखी शिक्षा है।
इसके पाँच अंग है–
1-शारीरिक विकास
2-प्राणिक विकास
3= मानसिक विकास
4-नैतिक विकास
5-अध्यात्मिक विकास

शिक्षण कौशल - पंचकोश विज्ञान (साप्ताहिक पाठ)

पंचकोश विज्ञान क्या है एवं विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में पंचकोशों की क्या भूमिका रहती है आज इस कौशल का अध्ययन करेंगे....
योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं। ये कोश एक साथ विद्यमान अस्तित्व के विभिन्न तल समान होते हैं। विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है। प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ संबंध होता है। वे एक दूसरे को प्रभावित करती और होती हैं।
ये पाँच कोश हैं -
अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित। शरीर और मस्तिष्क।
प्राणमय कोश - प्राणों से बना।
मनोमय कोश - मन से बना।
विज्ञानमय कोश - अंतर्ज्ञान या सहज ज्ञान से बना।
आनंदमय कोश - आनंदानुभूति से बना।
योग मान्यताओं के अनुसार चेतन और अवचेतन मान का संपर्क प्राणमय कोश के द्वारा होता है[1]। स्वामी सत्यानंद सरस्वती द्वारा लिखित स्वर योग के तहत कोशों के मनोवैज्ञानिक आयाम, शारीरिक दशा और अनुभूति के प्रकार का उल्लेख किया गया।


सा विद्या या विमुक्तये

सा विद्या या विमुक्तये
(साप्ताहिक पाठ)

विद्या किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा करते हुए शास्त्रकारों ने सूत्र रूप में कह दिया है कि- ‘सा विद्या या विमुक्तये’ विद्या वह है कि जो मुक्ति प्रदान करे। जिसके द्वारा हम रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि की दासता से मुक्ति प्राप्त कर सकें वह विद्या है। ऐसी विद्या को प्राप्त करने वाले विद्वान कहे जाते हैं।

प्राचीन समय में आज के जितने स्कूल कालेज न थे। पढ़ने वाले छात्रों को एक गधे के बोझ की बराबर पुस्तकें लादकर यों स्कूल न जाना पड़ता था। दिन-रात आवश्यक बातें रटाने की पद्धति की आज की शिक्षा प्रणाली का कहीं दर्शन भी न था। तो भी लोग विद्वान होते थे। उपयोगी शिक्षा और विद्या का इतना अधिक प्रचलन था कि हर ग्राम और नगर स्वतः एक कालेज था। वहाँ के निवासी अपने घर वालों, कुटुम्बियों और नगर निवासियों से ही बहुमूल्य ज्ञान प्राप्त कर लेते थे। तोता रटंत की अपेक्षा जीवन की उपयोगी और आवश्यक शिक्षा क्रियात्मक रीति से प्राप्त की जाती थी। प्रत्यक्ष प्रमाण और अनुभव द्वारा वे तथ्य शिक्षार्थियों को भली प्रकार हृदयंगम हो जाते थे।

मेघनाद, कुम्भकरण, अंगद, हनुमान, जामवंत से योद्धा, अर्जुन, भीम, भीष्म, द्रौण जैसे महारथी बी. ए. पास थे या मेट्रिक्युलेट थे इसका कुछ पता नहीं चलता। दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, खगोल, भूगर्भ, प्राणिशास्त्र, रसायन, शिल्प, वास्तु, अर्थ, नीति, धर्म, अध्यात्म आदि विषयों के विशेषज्ञ घर-घर में होते थे। इन विषयों की वे क्रियात्मक जीवन में अनुभव पूर्ण शिक्षा प्राप्त करते थे और अपने विषय के सुयोग्य ज्ञाता बन जाते थे। पुरुष के समान स्त्रियाँ भी अपनी विद्वत्ता में शिक्षा में आगे बढ़ी-चढ़ी थीं। स्त्रियों के कालेज कहीं थे इसका पता इतिहास के पन्ने नहीं देते पर इतना जरूर बताते हैं कि आज की ‘कालेज गर्ल्स’ की अपेक्षा उस समय की ललनाएं हर दृष्टि से अधिक सुशिक्षित होती थीं।

कबीर, रैदास, दादू आदि संत शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए कहे जा सकते हैं। वे साहित्य और व्याकरण के उतने विद्वान न थे तो भी आज के एल. टी. प्रोफेसरों की अपेक्षा उनकी विद्या वास्तविक थी। अकबर पढ़े-लिखे न थे, पंजाब केशरी महाराणा रणजीतसिंह की शिक्षा नहीं के बराबर थी, छत्रपति शिवाजी शिक्षित न थे पर जो कुछ उनने सीखा था वह आज के फटे हाल ग्रेजुएटों की अपेक्षा बहुत उपयोगी एवं वास्तविक था।

हम क्या पढ़ें? एवं बच्चों को क्या पढ़ावें? इस प्रश्न का सीधा सा उत्तर शास्त्रकार इस प्रकार देते हैं कि जिस ज्ञान के आधार पर दुखदायी बन्धनों से छुटकारा प्राप्त किया जा सके वही विद्या है, उसे ही पढ़ो। रोग, शोक, द्वेष, पाप, दीनता, दासता, गरीबी, बेकारी, अभाव, अज्ञान, दुर्गुण, कुसंस्कार आदि के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक बन्धनों से मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता-शक्ति जिस उपाय द्वारा मिले वहीं विद्या है उसे ही सीखना और सिखाना उचित है।

आज की शिक्षा उपरोक्त कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त बिल्कुल निकम्मी सिद्ध होती है। जीवन का एक तिहाई भाग स्कूल कालेजों के कैद खाने में व्यतीत करने के बाद हमारे बालक जब बाहर आते हैं तो वे उपरोक्त बंधनों से छूटना तो दूर उलटे जब स्कूल में प्रवेश हुए थे उसकी अपेक्षा भी अधिक जकड़े हुए निकलते हैं। शील, स्वास्थ्य, संयम, विवेक, विनय, श्रद्धा, उत्साह, वीरत्व, सेवा, सहयोग आदि विद्या द्वारा प्राप्त होने वाले स्वाभाविक फल जब उनमें दृष्टिगोचर नहीं होते तो फिर किस प्रकार कहा जा सकता है कि उन्होंने विद्या प्राप्त की है या वे विद्वान हो गये हैं।

अन्धानुकरण करके अपने बालकों के इस निरर्थक एवं हानिकर शिक्षा का भार लादकर उनके स्वास्थ्य और जीवन विकास से रोकना उचित नहीं। इतनी खर्चीली, इतनी श्रम साध्य शिक्षा जब विद्या से प्राप्त होने वाले सुफल की उपस्थित नहीं करती वरन् उलटे परिणाम उत्पन्न करती है-तो उसे अविद्या या कुशिक्षा ही कह सकते हैं। इस कुशिक्षा में बालकों के जीवन कि विकासोन्मुखी-प्रमुख भाग बर्बाद कर दिये जाने पर भविष्य में वे कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगे इसकी संभावना बहुत कम रह जाती है। किशोरावस्था का पुष्प, तोता रटन्त में रात-रात भर जागकर जब मसल डाला जाय तो फिर उस पर उत्तम फल लगने की क्या आशा की जा सकती है?

उच्च शिक्षा के नाम पर प्रचलित वर्तमान अनुपयोगी शिक्षा से हमारा कुछ भी भला नहीं हो सकता। अब हमें ऐसी शिक्षा का निर्माण करना होगा जो क्लर्क बाबू ढालने की फैक्टरी न रह कर शिक्षार्थी के जीवन विकास में सर्वतोमुखी सहायता प्रदान करे। उस शिक्षा में अनावश्यक पुस्तकों का गर्दभ भार न रह कर अनुभवी क्रिया कुशल आचार्यों द्वारा जीवनोपयोगी व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था होगी। वही शिक्षा हमारे बालकों को सफल योद्धा, व्यापारी, नेता, सेवक, शिल्पी वैज्ञानिक आदि बना सकेगी। उस धार्मिक आधार पर खड़े हुए शिक्षण से ही मनुष्यों के बीच सच्चे प्रेम और सद्भाव की स्थापना होगी और सुख शान्तिमय लोक परलोक का निर्माण होगा।

आइए, हम लोग ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण करें, उसके निर्माण की आज के अन्धकार युग में सर्वोपयोगी आवश्यकता है।



प्रैक्टिकल एवं प्रोजेक्ट

प्रैक्टिकल एवं प्रोजेक्ट (20 अंक)

1- आज आपको Android ऐप "विद्या भारती ई-पाठशाला" भेजा जा रहा है इस एपीके apk फाइल को आप अपने मोबाइल में insttal कर लीजिए इससे विद्या भारती की E पाठशाला के सारे PDF एवं वीडियो आप अपने मोबाइल में देख सकेंगे, एवं अपलोड कर सकेंगे इस ऐप में अभी तक के सारे कंटेंट आपको प्राप्त हो सकेंगे।
यह आपकी सुविधा के लिए बनाया गया ऐप है
आपके कमेंट अवश्य भेजे।

इस ऐप को डाउनलोड करने के पश्चात आप स्क्रीन शॉट भेजिए इस कार्य के आपको 10 अंक प्राप्त होंगे । (10अंक)

2- दूसरा कार्य आपको करना है न्यूनतम 5 आचार्य को यह ऐप भेजना है, जितने अधिक आचार्य आपके द्वारा इस ऐप को डाउनलोड करेंगे प्रत्येक आचार्य के मान से 2 अंक आपको प्राप्त होंगे आपको आचार्य का नाम एवं मोबाइल नंबर मुझे WhatsApp करना
है। (10अंक)

नोट-क्लिक करने पर फ़ाइल आपके डाउनलोड में यह फाइल सेव हो जायेगी। वहां पर जाकर इंस्टॉल कीजिए एवं ऐप्स सेटिंग में जाकर unknown source को ok कर इसको क्लिक कीजिए तब यह ऐप इंस्टॉल हो जाएगा

क्रियात्मक अनुसन्धान

क्रियात्मक अनुसन्धान
सामान्य अर्थ में किसी व्यक्ति द्वारा अपनी क्रियाओ को सुधारने की विधियों की खोज करना ही क्रियात्मक अनुसन्धान है.
क्रियात्मक अनुसंधान क्रियात्मक अनुसंधान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यवहारिक कार्यकर्ता वैज्ञानिक विधि से अपनी समस्याओं का अध्ययन अपने निर्णय और क्रियाओं मे निर्देशन, सुधार और मूल्यांकन करते है।



"विद्याभारती E पाठशाला" फीडबैक फॉर्म

"विद्याभारती E पाठशाला" फीडबैक फॉर्म
E पाठशाला फीडबैक फॉर्म भरकर आप प्रोजेक्ट कार्य संपन्न कर 10 बोनस अंक प्राप्त करें......

नीचे दी गई लिंक पर क्लिक कीजिये इस के बाद एक फॉर्म आप को प्राप्त होगा इस फॉर्म को भरकर आप सबमिट कीजिये इस प्रोजेक्ट कार्य को संपन्न करने के 10 अंक आप को प्राप्त होंगे....

कक्षा प्रबंधन

एक सक्रिय कक्षा का निर्माण निश्चित रूप से काफी श्रमसाध्य है, लेकिन उसका प्रबंधन तो और भी कठिन है। लेकिन एक बार यह आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाए, इसके बाद आप एक खुशमिजाज़ शिक्षक होंगे और बच्चे भी प्रसन्न और सृजनशील होंगे। लेकिन ऐसी स्थिति तक पहुंचना थोड़ा मुश्किल और तनावयुक्त हो सकता है।
अगर आपके पास बहुत-सी तरह-तरह की गतिविधियां हों और आप उन्हें रोज़ करवाएं तो आप पाएंगे कि बच्चों को पढ़ाना कितना आसान हो गया है। आप बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बांटकर उनके साथ काम कर सकेंगे।
हर बच्चे को आपके समय व ध्यान की ज़रूरत होती है। कुछ बच्चों को अंकों के संबंध में आपकी मदद की ज़रूरत पड़ती है तो कुछ को भाषा को लेकर आपके विशेष ध्यान की। आप इन सभी बच्चों की तभी मदद कर सकते हैं जब बाकी कक्षा अलग-अलग कामों में व्यस्त रहे।
इसे हम इस तरह समझ सकते हैं। अगर आप क्लास में एक गतिविधि आयोजित करते हैं जो दो हफ्ते बाद दुबारा करवाई जाएगी, तो बच्चों का प्रबंधन काफी मुश्किल हो जाएगा। उदाहरण के लिए अगर आप यह तय करते हैं कि आज सभी बच्चे क्ले एरिया में ही काम करेंगे तो मिट्टी के लिए सभी 30 से 40 बच्चों में धक्का-मुक्की होने लगेगी। या मान लीजिए आप किसी दिन तय करते हैं कि आज बच्चे कहानियों-कविताओं की पुस्तकें पढेंगे। ऐसे में अगर आपकी कक्षा की लाइब्रेरी में केवल 15 पुस्तकें हुईं तो बाकी बच्चे क्या करेंगे? किताबें पाने के चक्कर में कक्षा में इतनी अफरा-तफरी मच जाएगी कि आप ‘लर्निंग क्लास रूम’ के विचार को ही अलविदा कहने का मन बना लें।

कक्षा प्रबंधन PDF

शैक्षिक नवाचारों का उद्भव

“शैक्षिक नवाचारों का उद्भव स्वतः नहीं होता वरन् इन्हें खोजना पड़ता है तथा सुनियोजित ढंग से इन्हें प्रयोग में लाना होता है, ताकि शैक्षिक कार्यक्रमों को परिवर्तित परिवेश में गति मिल सके और परिवर्तन के साथ गहरा तारतम्य बनाये रख सकें।”


नवाचार

शिक्षण को लीक से हटकर रोचकता तथा गुणवत्ता के विकास की दृष्टि से शिक्षण कार्य करने को नवाचार कहा गया है....
आज शिक्षण को नवाचार युंक्त बनाने की चर्चा सर्वत्र चल रही है।
दैनिक शिक्षण में परिवर्तन एवं प्रयोगात्मक शिक्षण को रूचिकर एवं गुणात्मक बनाना ही नवाचार है।

इस प्रकार के बिन्दुओं का उल्लेख किया जा रहा है । जिसके आधार पर नवाचार की शिक्षा से हर व्यक्ति परिचित हो सकता है ।
- नवाचार लीक से हटकर किया गया शैक्षिक कार्य है, जो स्वयं स्वीकार्य है।
- नवाचार की पृष्ठ भूमि जानी, पहचानी तथा अपने अनुभव से जुड़ी होना चाहिए ।
- नवाचार की सुनिष्चत प्रक्रिया हो तथा वह प्रक्रिया कर्ता से ऐसे जुड़े जैसे वह स्वयं के लिए स्वयं द्वारा स्वयं से विकसित पहल है।
- नवाचार विशेष उद्देष्य /उद्देष्यों के पूर्ति का साधन हो।
- नवाचार कर्ता की अनुमति तथा आवष्यकता से सम्बद्ध हो।
- कर्ता अपनी आवश्यकतानुसार उसमें परितर्वन, संर्वधन तथा विकसित करने में समर्थ है।
- अन्य व्यक्तियों द्वारा उसे अपने परिवेष में प्रयोग मेे लाया जा सके।



पाठ्य सहगामी क्रियायें व्यवहार

पाठ्य सहगामी क्रियायें
पाठ्य सहगामी क्रियाएं छात्र जीवन के लिए महत्वपूर्ण है और इन्हीं के माध्यम से छात्र अपनी प्रतिभा को सभी के सामने ला पाता है।
आप इस विषय में क्या कर रहे है....
आप के विद्यालय में कौन कौन सी पाठय सहगामी क्रियाये होती है.



पाठ्य सहगामी क्रियायें

पाठ्य सहगामी क्रियायें
पाठ्य सहगामी क्रियाएं छात्र जीवन के लिए महत्वपूर्ण है और इन्हीं के माध्यम से छात्र अपनी प्रतिभा को सभी के सामने ला पाता है।

शिक्षा समाज में, समाज के द्वारा समाज के लिए दी जाती है। शिक्षक और समाज का घनिष्ठ संबंध है। शिक्षा समाज में परिवर्तन लाने का सार्थक एवं सशक्त साधन है। शिक्षा की प्रक्रिया के द्वारा ही नए युवकों में ऐसे गुणों का विकास किया जा सकता है जो स्वस्थ समाज के लिए वांछनीय है। बालक के सर्वांगीण विकास हेतु निम्न पक्षों के विकास आवश्यक है- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावात्मक विकास । पाठ्यक्रम के अंतर्गत विद्यालय के विषयों के शिक्षण में छात्रों के ज्ञानात्मक पक्ष का विकास अधिक होता है। लेकिन भावात्मक और क्रियात्मक पक्षों का विकास नहीं हो पाता इसलिए इन पक्षों के विकास के लिए पाठ्य सहगामी क्रियाओं का सहारा लिया जाता है। विद्यालयों में आज हम इन क्रियाओं को शिक्षा पद्धति का महत्वपूर्ण अंग स्वीकार करते हैं । पाठ्यक्रम का आज जब विकसित अर्थ लिया जाता है तो समुचित विकास के लिए इन सहगामी क्रियाओं को पाठ्यक्रम में उचित स्थान देना आवश्यक है।


पाठ्य सहगामी क्रियाएं छात्रों को अच्छा नागरिक बनने का प्रशिक्षण देती हैं । ऐसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों को स्कूल में व्यस्त रखती है। पाठ्य सहगामी क्रियाएं शिक्षण में श्रेष्ठ स्थान रखती है और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में पूरा-पूरा योगदान देती है। इनमें शामिल होकर छात्र अपने गुणों की क्षमता से आगे निकलकर विकास करता है। उनमें आत्मनिर्भरता आती है। वे किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए सक्षम बनते है।


पाठ्य सहगामी क्रियाएं की उपयोगिता

  1. इनसे छात्रों में नागरिक के गुणों के विकास हेतु अवसर प्रदान किया जाते है।
  2. छात्रों में नेतृत्व के गुणों का विकास होता है।
  3. छात्रों को नवीन प्रकार की अभिरुचियों के विकास के लिए अवसर मिलते है।
  4. पाठ्य सहगामी क्रियाओं के अंतर्गत छात्रों में समाजीकरण होता होता है।
  5. इन गतिविधियों के माध्यम से बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है।
  6. सभी को अपनी प्रतिभा दिखाने के समान अवसर मिलते है।
  7. किसी भी गतिविधि के दौरान विद्यार्थियों में आपस में सामाजिक अंतर्क्रिया होती है, जिनसे उन्हें आपस में बहुत कुछ सीखने के अवसर प्राप्त होते है।
  8. विद्यार्थियों में आत्मविश्वास का विकास होता है।
  9. उनमें पारस्पारिक सहभागिता का विकास होता है ।
  10. उनमे सीखने की रूचि उत्पन्न करता है ।
  11. समूह अधिगम में सहायक होता है ।

ये कौन सा शिक्षण सूत्र है

ये कौन सा शिक्षण सूत्र है
कल हमने शिक्षण सूत्रों का अध्ययन किया था ...आज हम विडिओ देखकर समझने की कोशिश करते है.
नीचे 6 विडियो दिए है आप विडियो देखकर बताने का प्रयास कीजिये की इसमें कौन सा सूत्र प्रयोग में लाया गया है.
हो सकता है एक विडिओ में 2-3 सूत्रों का उपयोग भी हुआ हो.
कमेंट्स बॉक्स में विडियो नम्बर एवं सूत्र लिखिए.






शिक्षण सूत्र

शिक्षण सूत्र
प्रत्येक आचार्य की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो। इसके लिये आचार्य को कई बातों को जानकर उन्हे व्यवहार में लाना पड़ता है, यथा - पाठ्यवस्तु का आरम्भ कहां से क्या जाय, किस प्रकार किया जाय, छात्र इसमें रुचि कैसे लेते रहें, अर्जित ज्ञान को बालकों के लिये उपयोगी कैसे बनाया जाय, आदि।

शिक्षाशात्रियों ने शिक्षकों के लिये आवश्यक बातों पर विचार करके अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जिन्हें शिक्षण सूत्र के रूप में जाना जाता है.
प्रमुख शिक्षण सूत्र इस प्रकार है...
(१) ज्ञात से अज्ञात की ओर
बालक के पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करते हे यदि नया ज्ञान प्रदान किया जाता है तो बालक को उसे सीखने में रूचि व प्रेराना प्राप्त होती है। मनुष्य सामान्यतया इसी क्रम से सीखता है। इसलिये अध्यापक को अप्नी पाठ्य सामग्री इस क्रम में प्रस्तुत करना चाहिये।
(२) सरल से कठिन की ओर
पाठ्यवस्तु को इस प्रकार प्रस्त्तुत करना चाह्ये कि कि उसके सरल भागों का ज्ञान पहले करवाया जाय तथा धीरे-धीरे कठिन भागों को प्रस्तुत किया जाय।
(३) सरल से जटिल (गूढ़) की ओर
(४) स्थूल से सूक्ष्म की ओर
सूक्ष्म तथा अमूर्त विचारों को सिखाते समय उनका प्रारम्भ आसपास की स्थूल वस्तुओं तथा स्थूल विचारों से करना चाहिये। बालक की शिक्षा सदैव स्थूल वस्तुओं तथा तथ्यों से होनी चाहिये; शब्दों, परिभाषाो तथा नियमों से नहीं।
(५) विशेष से सामान्य की ओर
किसी सिद्धान्त की विशेष बातों को पहले रखे, फिर उनका सामान्यीकरण करना चाहिये। गणित, विज्ञान, व्याकरण्, छन्द व अकंकार शास्त्र की शिक्षा देते समय इसी क्रम को अपनाना चाहिये। आगमन प्रणाली में भी इसी का उपयोग होता है।
(६) अनुभव से तर्क की ओर
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बालक यह तो जान लेता है कि अमुक वस्तु कैसी है किन्तु वह यह नहीं जानता कि वह ऐसी क्यों है। बार-बार निरीक्षण व परीक्षण से वह इन कारणों को भी जान जाता है। अर्थात् वह अनुभव से तर्क की ओर बढ़ता है। बालक के अनुभूत तथ्यों को आधार बनाकर धीरे-धीरे निरीक्षण व परीक्षण द्वारा उनकी तर्कशक्ति का विकास करने का प्रयत्न करना चाहिये।
(७) पूर्ण से अंश की ओर
बालक के सम्मुख उसकी समझ में आने योग्यपूर्ण वस्तु या तथ्य को रखना चाहिये। इसके बाद उसके विभिन्न अंशों के विस्तृत ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिये। यदि एक पेड़ का ज्ञान प्रदान करना है तो पहले उसका सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत किया जायेगा तथा बाद में उसकी जड़ों, पत्तियों, फलों आदि का परिचय अलगलग करवाया जायेगा।
(८) अनिश्चित से निश्चित की ओर
(९) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
(१०) तर्क पूर्ण विधि का त्याग व मनोवैज्ञानिक विधि का अनुसरण करो
वर्तमान समय में मनोविज्ञान के प्रचार के कारण इस बात पर जोर दिया जाता है कि शिक्षण विधि व क्रम में बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, रुचियों, जिज्ञासा और ग्रहण शक्ति को ध्यान में रखा जाय।
(११) इन्द्रियों के प्रशिक्षण द्वारा शिक्षा
(१२) प्रकृति का आधार


खेल-खेल में शिक्षा

खेल-खेल में शिक्षा
स्वाभाविक रूप से बचपन खेल-कूद के लिये होता है. छात्रों की गतिविधियां उनके परिवेश और रूचि पर निर्भर करती है. यही कारण है कि किताबी ज्ञान उन्हें अरूचिकर लगता है. हर समय शिक्षक द्वारा पढ़ाये गये पाठ, होम वर्क, परीक्षा आमतौर पर छात्रों को बोझिल लगने लगती है. संभव है, ऐसे में किताबों और विद्यालय से उसे ऊब होने लगे. यह सर्वविदित है कि गणित और विज्ञान जैसे विषय छात्रों को नीरस लगते हैं. विद्यालयी शिक्षा शुरू होते ही छात्रों को हर समय उनके अभिभावक पढ़ने के लिये प्रेरित करते नजर आते हैं. अक्सर सुनने को मिलता है - खेल में ही दिमाग लगा रहता है, किताबें तो छू कर भी नही देखता. कुछ अभिभावक ऐसे भी होते हैं, जिन्हे अपनी आजीविका के चलते बच्चों की शिक्षा पर उनका न तो ध्यान होता है और न ही रूचि. परिणामस्वरूप छात्र किताबों से दूर भागने लगते हैं या उनके हाथ में किताब होती है लेकिन उनका मस्तिष्क किसी और लोक में विचरण कर रहा होता है. इन्हीं समस्याओं से मुक्ति पाने और छात्रों को शिक्षित करने के लिये समय-समय पर नवाचारों का जन्म होता रहा है. ऐसा ही एक नवाचार है - खेल-खेल में शिक्षा यानी उन खेलों के माध्यम से शिक्षा जिनमें छात्रों की स्वाभाविक रूचि होती है।

खेल खेल में शिक्षा के 3 पीडीएफ का अध्ययन कीजिये एवम अपने सुझाव अथवा विद्यालय में अपने इस प्रकार कोई प्रयोग किया हो तो अवगत कराइये।






आचार्यों द्वारा भेजे खेल TLM

आचार्यों द्वारा भेजे खेल TLM
श्री महेश त्यागी प्राचार्य गुना के द्वारा भेजे गए खेल खेल में शिक्षा के छात्रों के उपयोग हेतु सहायक सामग्री।
क्या आप भी इस प्रकार की सामग्री अपने विद्यालय में बना सकते है।





























बाल केन्द्रित शिक्षा के अंतर्गत पाठ्यक्रम का स्वरुप

बाल केन्द्रित शिक्षा के अंतर्गत पाठ्यक्रम का स्वरुप
बाल केन्द्रित शिक्षा के पाठ्यक्रम में बालक को शिक्षा प्रक्रिया का केंद्रबिंदु माना जाता है. बालक की रुचियों, आवश्यकताओं एवं योग्यताओं के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है. बाल-केन्द्रित शिक्षा के अंतर्गत पाठ्यक्रम का स्वरुप निम्नलिखित होना चाहिए:
 पाठ्यक्रम जीवनोपयोगी होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम पूर्वज्ञान पर आधारित होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम बालकों की रूचि के अनुसार होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम वातावरण के अनुसार होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय भावनाओं को विकसित करने वाला होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम समाज की आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम बालकों के मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए.
 पाठ्यक्रम में व्यक्तिगत भिन्नता को ध्यान में रखा जाना चाहिए.
 पाठ्यक्रम शैक्षिक उद्देश्य के अनुसार होना चाहिए.




बालकेन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका

बालकेन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका
शिक्षक, शिक्षार्थियों का सहयोगी व मार्गदर्शक होता है. बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका और बढ़ जाती है. बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक को---
बालकों का सभी प्रकार से मार्गदर्शन करना चाहिए तथा विभिन्न क्रिया-कलापों को क्रियान्वित करने में सहायता करना चाहिए
शिक्षा के यथार्थ उद्देश्यों के प्रति पूर्णतया सजग रहना चाहिए
शिक्षक का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना मात्र ही नहीं होता वरन बाल-केन्द्रित शिक्षा का महानतम लक्ष्य बालक का सर्वोन्मुखी विकास करना है, अतः इस उद्देश्य की पूर्ती के लिए बालक की अधिक से अधिक सहायता करनी चाहिए
बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक को स्वतंत्र रह कर निर्णय लेना चाहिए कि बालक को क्या सिखाना है?

संलग्न वीडियो अवश्य देखें एवम संग्रहित (डाउनलोड) कर रखें।