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इस प्रेरक कहानी के साथ अवकाश का आनंद लीजिये

परफॉर्मेंस
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सर ! आपके कितने स्टूडेंट्स हैं ? भट्ट मैम ने बक्षी सर से पूछा -" रात के फ़ूड पैकेट्स के लिए क़्वान्टिटी तय करनी है "
" टोटल फोर्टी टू मैम " उँगलियों पर हिसाब लगा बक्षी सर ने जवाब दिया और फिर सुलक्षणा के साथ उसकी ड्रेस ठीक करवाने में जुट गए l यूँ तो कव्वाल की भूमिका के लिए सुलक्षणा को वह ड्रेस कुल आठ मिनिट ही पहनना थी स्टेज पर लेकिन उसकी फिटिंग 'परफेक्शनिस्ट बक्षी सर' को पसंद नहीं थी तो पिछले आधे घंटे से गुरु-शिष्या लगे हुए थे ठीक करने में l सर का जवाब सुनकर सुलक्षणा चौक गई " सर ने गलती से तो नहीं बोल दिया " उसने खुद पूरे ग्रुप को मन ही मन गीना " सत्ताईस ही तो हो रहे हैं, सर ने पंद्रह ज्यादा क्यों बता दिए होंगे ...गलती से या .... ?" पर ड्रेस में उलझी सुलक्षणा चुप ही रही l थोड़ी ही देर में दूसरी बातों में वह फ़ूड पैकेट्स की बात भूल भी गई l
दोपहर एक बजे से आये विद्यार्थियों ने जी-जान लगा दी अपने वार्षिकोत्सव को सफल बनाने में l पालकों को भी सारी प्रस्तुतियाँ बेहद पसंद आई ...दर्शकों की देर तक गूँजती तालियाँ प्रतिभागी विद्यार्थियों में लगातार ऊर्जा भर रही थी l रात साढ़े नौ तक उनका शरीर थक कर चूर हो गया था पर मन चहक रहा था l हर तयारी को ठीक करने में लगे बक्षी सर की भूमिका अब बदल गई थी ... जिद्दी परफेक्शनिस्ट अब ममतामयी माँ में बदल गए थे ..अधिकार से, प्यार भरी डाँट के साथ वे समूह के हर प्रतिभागी विद्यार्थी को फ़ूड पैकेट देकर आग्रहपूर्वक खिला रहे थे l सुलक्षणा अपनी ड्रेस बदलकर उन्हें सौपने उनके पास गई तभी रूपा बाई भी वहाँ आ गई थी -" सर ! पूरा ग्राउंड साफ़ कर दिया है स्टेज भी हो गया है ..हॉल की सफाई सलीम, दिनेश, नवीन और बबलू कर रहे हैं ..और क्या करना है ? "
" नहीं उसके बाद कुछ नहीं है l वह होते ही सबको मेरे पास भेजो " सर ने जवाब दिया "..और रूपा बाई ! ये बच्चों के लिए पानी की कैन और कुछ डिस्पोजेबल ग्लास भेजो शीला बाई के साथ "
" हव सर "
शीला बाई पानी देने आई तो दो छोटे बच्चे भी थे उसके साथ " अरे ये बच्चे ? " सर ने पूछा " मेरे हैं सर, इत्ती रात में वापस जाने तक किसके पास छोड़ती इसलिए साथ ले आई " शीला बाई ने पानी की केन रख दी और एक ग्लास पानी सर को दिया .. शीला बाई के बच्चे हसरत भरी नज़रों से दूसरे बच्चों को खाते देख रहे थे ...उनकी आँखों में समोसे की लालसा और चेहरे पर पेट की भूख पसरी हुई थी बक्षी सर यूँ तो आर्ट के टीचर थे पर उनकी भूख का गणित समझना उनके लिए मुश्किल नहीं था " दोपहर एक बजे से आये हैं ये बच्चे भी तो " ..तुरंत दो फ़ूड पैकेट्स उन्होंने शीला बाई को दिए -" तुम्हे भी तो नहीं मिला होगा अब तक ? तुम्हारा भी एक ले जाओ " कहकर एक और पैकेट दिया .. सुलक्षणा एक ओर खड़ी यह सब देख रही थी l तब तक बाकि सफाई कर्मचारी भी आ गए थे l बक्षी सर ने सबको फ़ूड पैकेट्स देना शुरू किये l सुलक्षणा के दिमाग में दोपहर का फ़ूड पैकेट्स का हिसाब घूम गया l उसने गिनना शुरू किये ... एक, दो, तीन ... गिनती चौदह पर जाकर रुकी l इसके साथ ही शीला बाई को दिए तीन पैकेट्स और जोड़ दिए तो सत्रह हो गए .. " अच्छा तो सर ने पंद्रह पैकेट इसी लिए ज्यादा बताये थे पर यहाँ तो सत्रह हो गए ? सर का हिसाब कभी गलत नहीं होता .. हाँ पर शीला बाई के दो बच्चों को सर ने थोड़ी गीना होगा ...इसका मतलब सर ने अपना पैकेट भी ...... "
.... सुलक्षणा ने महसूस किया " चश्मा लगाए, कमज़ोर सा दिखता वह शख्स कितना मज़बूत है जिसे लोग बक्षी सर सम्बोधित करते हैं l मैनेजमेंट से वह भले ही लड़ नहीं सकते पर अपने साथियों के लिए रास्ता ज़रूर बनाया उन्होंने ...सच्चे दलपति है बक्षी सर ... पर सर को क्या इतनी भूख लग रही है कि अपना पैकेट देकर वे इतना परेशान हो रहे हैं ? " फिर उसे ही ध्यान आया कि जब वह कपडे बदलने गई थी तब सभी को पैकेट बाँटे जा चुके थे सिर्फ वह खुद और बक्षी सर ही बचे थे .. " यानि सर ने जो दो पैकेट्स शीला बाई के बच्चो के दिए हैं वह उसके और बक्षी सर के हिस्से के हैं " ...अब सर की परेशानी शिष्या भाँप गई .. दबे पाँव वापस लौट गई ..तेज क़दमों से मेन गेट से बाहर होती हुई सड़क के पार इटिंग जॉइंट पर जा पहुंची -" भैया चार समोसे और दो पुडिंग देना " पर्स में देखा तो बदकिस्मती से पैसे कम थे -" भैया एक पुडिंग कम कर देना " दो कैरी बैग्स में समोसे और पुडिंग लेकर वह झटपट बक्षी सर के पास पहुँची -" सर आपके लिए " " ये क्या है ? " आँखों में सवाल लेकर बक्षी सर ने अपनी पॉलिथीन में झाँका, दो समोसे और एक पुडिंग... सर एक मिनिट अवाक् खड़े रहे पर गणित बेहतरीन था उनका, अगले ही पल सब समझ गए ...मुस्कुरा दिए पर फिर उन्हें चश्मा निकाल कर आँखे भी पोछनी पड़ गई उसी समय l
" सर ! फ़ूड पैकेट के समोसे मुझे पसंद नहीं इसलिए अपनी पसंद के लाने गई थी "
दोनों के कद का कोई माप किसी के पास नहीं था पर गुरु शिष्या को ऊँचा मान रहा था जबकि शिष्या के लिए गुरु पहले से बड़े थे, आज और ज्यादा ऊँचे हो गए थे l बक्षी सर ने सुलक्षणा का सर प्यार से सहला दिया ...उसी समय झुककर सुलक्षणा ने उनके पैर छू लिए -" सर ! कैसी रही आज की हमारी परफॉर्मेंस ? "

शिक्षा और संस्कार

शिक्षा और संस्कार
मशहूर फिल्म कलाकार आशुतोष राणा का यह पाती

अपने बच्चों की खातिर समय निकाल कर जरूर पढियेगा....

आज मेरे पूज्य पिताजी का जन्मदिन है सो उनको स्मरण करते हुए एक घटना साँझा कर रहा हूँ।

बात सत्तर के दशक की है जब हमारे पूज्य पिताजी ने हमारे बड़े भाई मदनमोहन जो राबर्ट्सन कॉलेज जबलपुर से MSC कर रहे थे की सलाह पर हम ३ भाइयों को बेहतर शिक्षा के लिए गाडरवारा के कस्बाई विद्यालय से उठाकर जबलपुर शहर के क्राइस्टचर्च स्कूल में दाख़िला करा दिया। मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में क्राइस्टचर्च उस समय अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में अपने शीर्ष पर था।
पूज्य बाबूजी व माँ हम तीनों भाइयों ( नंदकुमार, जयंत, व मैं आशुतोष ) का क्राइस्टचर्च में दाख़िला करा हमें हॉस्टल में छोड़ के अगले रविवार को पुनः मिलने का आश्वासन दे के वापस चले गए।

मुझे नहीं पता था की जो इतवार आने वाला है वह मेरे जीवन में सदा के लिए चिन्हित होने वाला है, इतवार का मतलब छुट्टी होता है लेकिन सत्तर के दशक का वह इतवार मेरे जीवन की छुट्टी नहीं "घुट्टी" बन गया।

इतवार की सुबह से ही मैं आह्लादित था, ये मेरे जीवन के पहले सात दिन थे जब मैं बिना माँ बाबूजी के अपने घर से बाहर रहा था। मन मिश्रित भावों से भरा हुआ था, हृदय के किसी कोने में माँ,बाबूजी को इम्प्रेस करने का भाव बलवती हो रहा था , यही वो दिन था जब मुझे प्रेम और प्रभाव के बीच का अंतर समझ आया। बच्चे अपने माता पिता से सिर्फ़ प्रेम ही पाना नहीं चाहते वे उन्हें प्रभावित भी करना चाहते हैं। दोपहर ३.३० बजे हम हॉस्टल के विज़िटिंग रूम में आ गए•• ग्रीन ब्लेजर, वाइट पैंट, वाइट शर्ट, ग्रीन एंड वाइट स्ट्राइब वाली टाई और बाटा के ब्लैक नॉटी बॉय शूज़.. ये हमारी स्कूल यूनीफ़ॉर्म थी। हमने विज़िटिंग रूम की खिड़की से स्कूल के कैम्पस में मेन गेट से हमारी मिलेट्री ग्रीन कलर की ओपन फ़ोर्ड जीप को अंदर आते हुए देखा, जिसे मेरे बड़े भाई मोहन जिन्हें पूरा घर भाईजी कहता था ड्राइव कर रहे थे,और माँ बाबूजी बैठे हुए थे।

मैं बेहद उत्साहित था मुझे अपने पर पूर्ण विश्वास था की आज इन दोनों को इम्प्रेस कर ही लूँगा। मैंने पुष्टि करने के लिए जयंत भैया जो मुझसे ६ वर्ष बड़े हैं उनसे पूछा मैं कैसा लग रहा हूँ ? वे मुझसे अशर्त प्रेम करते थे मुझे लेके प्रोटेक्टिव भी थे बोले शानदार लग रहे हो नंद भैया ने उनकी बात का अनुमोदन कर मेरे हौसले को और बढ़ा दिया।
जीप रुकी..

उलटे पल्ले की गोल्डन ऑरेंज साड़ी में माँ और झक्क सफ़ेद धोती कुर्ता गांधी टोपी और काली जवाहर बंड़ी में बाबूजी उससे उतरे, हम दौड़ कर उनसे नहीं मिल सकते थे ये स्कूल के नियमों के ख़िलाफ़ था, सो मीटिंग हॉल में जैसे सैनिक विश्राम की मुद्रा में अलर्ट खड़ा रहता है एक लाइन में तीनों भाई खड़े माँ बाबूजी का अपने पास पहुँचने का इंतज़ार करने लगे, जैसे ही वे क़रीब आए, हम तीनों भाइयों ने सम्मिलित स्वर में अपनी जगह पर खड़े खड़े Good evening Mummy. Good evening Babuji. कहा।
मैंने देखा good evening सुनके बाबूजी हल्का सा चौंके फिर तुरंत ही उनके चहरे पे हल्की स्मित आई जिसमें बेहद लाड़ था मैं समझ गया की ये प्रभावित हो चुके हैं । मैं जो माँ से लिपटा ही रहता था माँ के क़रीब नहीं जा रहा था ताकि उन्हें पता चले की मैं इंडिपेंडेंट हो गया हूँ .. माँ ने अपनी स्नेहसिक्त मुस्कान से मुझे छुआ मैं माँ से लिपटना चाहता था किंतु जगह पर खड़े खड़े मुस्कुराकर अपने आत्मनिर्भर होने का उन्हें सबूत दिया। माँ ने बाबूजी को देखा और मुस्कुरा दीं, मैं समझ गया की ये प्रभावित हो गईं हैं। माँ, बाबूजी, भाईजी और हम तीन भाई हॉल के एक कोने में बैठ बातें करने लगे हमसे पूरे हफ़्ते का विवरण माँगा गया, और ६.३० बजे के लगभग बाबूजी ने हमसे कहा की अपना सामान पैक करो तुम लोगों को गाडरवारा वापस चलना है वहीं आगे की पढ़ाई होगी•• हमने अचकचा के माँ की तरफ़ देखा माँ बाबूजी के समर्थन में दिखाई दीं। हमारे घर में प्रश्न पूछने की आज़ादी थी घर के नियम के मुताबिक़ छोटों को पहले अपनी बात रखने का अधिकार था, सो नियमानुसार पहला सवाल मैंने दागा और बाबूजी से गाडरवारा वापस ले जाने का कारण पूछा ? उन्होंने कहा रानाजी मैं तुम्हें मात्र अच्छा विद्यार्थी नहीं एक अच्छा व्यक्ति बनाना चाहता हूँ। तुम लोगों को यहाँ नया सीखने भेजा था पुराना भूलने नहीं। कोई नया यदि पुराने को भुला दे तो उस नए की शुभता संदेह के दायरे में आ जाती है, हमारे घर में हर छोटा अपने से बड़े परिजन, परिचित,अपरिचित जो भी उसके सम्पर्क में आता है उसके चरण स्पर्श कर अपना सम्मान निवेदित करता है लेकिन देखा की इस नए वातावरण ने मात्र सात दिनों में ही मेरे बच्चों को परिचित छोड़ो अपने माता पिता से ही चरण स्पर्श की जगह Good evening कहना सिखा दिया। मैं नहीं कहता की इस अभिवादन में सम्मान नहीं है, किंतु चरण स्पर्श करने में सम्मान होता है यह मैं विश्वास से कह सकता हूँ। विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं होती। मैंने देखा तुम अपनी माँ से लिपटना चाहते थे लेकिन तुम दूर ही खड़े रहे, विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने का हुनर देती है नाकि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है। आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया, व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय जो उसे सिर्फ़ साक्षर बनाए वह स्कूल, मैं नहीं चाहता की मेरे बच्चे सिर्फ़ साक्षर हो के डिग्रीयों के बोझ से दब जाएँ मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर दर्द को समझने उसके बोझ को हल्का करने की महारथ देना चाहता हूँ। मैंने तुम्हें अंग्रेज़ी भाषा सीखने के लिए भेजा था आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं। संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है। इसलिए बिस्तर बाँधो और घर चलो। हम तीनों भाई तुरंत माँ बाबूजी के चरणों में गिर गए उन्होंने हमें उठा कर गले से लगा लिया.. व शुभआशीर्वाद दिया कि किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो.. पूज्य बाबूजी जब भी कभी थकता हूँ या हार की कगार पर खड़ा होता हूँ तो आपका यह आशीर्वाद "किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो" संजीवनी बन नव ऊर्जा का संचार कर हृदय को उत्साह उल्लास से भर देता है । आपको शत् शत् प्रणाम
आशुतोष राणा

रोचक कहानी

रोचक कहानी
स्कूल खुल गए हैं, मैं अपने बेटे को पहले दिन स्कूल छोड़ने गया| अभी उसकी उम्र ही क्या है महज तीन साल, वह दादा-दादी से सुन-सुनकर स्कूल को अपनी कल्पना में बुन चुका था वह सोचता होगा कि स्कूल में उसके नऐ दोस्त बनेंगे जो उसके साथ खेलेंगे, झूला झूलेंगे ऊधम करेंगे खूब मजा़ आऐगा| उसकी यह कल्पनाऐं सच से सामना करने जा रही थीं| वह सुबह से ही तैयार होने मचल रहा था मां से जिद करके वह तैयार हुआ यूनीफॉर्म पहनी, स्कूल बेग कधों पर लटकाया और स्कूल के टाईम से पहले ही चलने की जिद करने लगा| स्कूल का टाईम होते ही मैं उसे लेकर स्कूल पंहुचा, वह बड़ा खुश हुआ| वह मेरे साथ खुद चलकर क्लास में गया तब तक कई बच्चे आ चुके थे अधिकांश रो रहे थे| मेरा बेटा उन्हे देखकर बोला पापा ये सब बच्चे रो क्यों रहे हैं, मैंने कहा बेटा ये पहली बार मम्मी-पापा से अलग होकर स्कूल आए हैं ना इसलिए रो रहे हैं| इतने में टीचर ने बेटे को क्लास में ले लिया वह कुछ समझ पाता तब तक गेट भी बंद कर दिया मुझे बेटे के रोने की आवाज आई, अपनी क्लास के सभी रोते बच्चों को देखकर वह भी रोने लगा था| नर्सरी की सभी क्लासेस से बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं|
मेरे मन में बेटे का सवाल फिर आया कि 'पापा ये सब बच्चे रो क्यों रहे हैं' पर इस बार मैंने खुद को जो उत्तर दिया वह अलग था कि 'आज से इन मासूमों का बचपन छिन रहा है ये इन्हे मालूम नहीं फिर भी रो रहे हैं'|
बड़ा भावनात्मक क्षण था वह, सवा घण्टे बाद जब छुट्टी हुई तो मेरा बेटा आते ही बोला, पापा ऐसा होता है स्कूल ? मैने कहा हां वह मुझे देख रहा था उसकी आंखे रोने से लाल हो गई थीं चेहरा उतरा हुआ था अब वह शांत था |
ग्लोबलाइजेशन के इस युग में कैरीयर को लेकर पेरेंट्स में इतनी अधिक चिंता है कि भाव पक्ष समाप्त सा हो गया है| कैसे भी अच्छे स्कूल कॉलेज में दाखिला दिलाकर बच्चे को ATM. बनाने की सोच हावी हो रही है ऐसे मे बच्चों का स्वाभाविक विकास उसकी रुचि, प्रकृति और क्षमताओं के अनुरूप नहीं हो पा रहा| मैकाले की शिक्षा पद्धति से पढ़े पेरेंट्स भी बच्चों को नौकरशाह बनाने पर आमादा हैं कर्जा लेकर इंजीनियर-डॉक्टर बनाने की स्पर्धा चल रही है| मध्यम वर्ग में ये चलन ज्यादा है, बच्चे इस आपा-धापी में माता पिता के पास होकर भी दूर हो रहे हैं|
अच्छी किताबी शिक्षा अत्यंत् अनिवार्य है, उससे अधिक अनिवार्य है अच्छे संस्कारों की शिक्षा जिसके गुरू हैं माता पिता और संस्थान है बच्चे का अपना घर| वह क्या बनेगा यह भविष्य में तय होगा पर बुनियाद अच्छी है तो वह अच्छा ही बनेगा बस उस पर अपने सपने थोपने के बजाए उसकी छिपी प्रतिभा समझकर उसके विकास के उपाय किए जांए| वर्ना हमारे आस- पास ऐसे कई उदाहरण मिल जाऐंगे कि बच्चों को कुछ बनाने के लिए उन्होंने कितना कुछ किया पर वो बन कुछ और गए|

विज्ञान चालीसा

विज्ञान चालीसा एक आचार्य द्वारा भेजी
विज्ञान चालीसा, एक बार ज़रूर पढ़ें
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जय न्यूटन विज्ञान के आगर,
गति खोजत ते भरि गये सागर ।...

ग्राहम् बेल फोन के दाता,
जनसंचार के भाग्य विधाता ।

बल्ब प्रकाश खोज करि लीन्हा,
मित्र एडीसन परम प्रवीना ।

बायल और चाल्स ने जाना,
ताप दाब सम्बन्ध पुराना ।

नाभिक खोजि परम गतिशीला,
रदरफोर्ड हैं अतिगुणशीला ।

खोज करत जब थके टाॅमसन,
तबहिं भये इलेक्ट्रान के दर्शन ।

जबहिं देखि न्यूट्रोन को पाए,
जेम्स चैडविक अति हरषाये ।

भेद रेडियम करत बखाना,
मैडम क्यूरी परम सुजाना ।

बने कार्बनिक दैव शक्ति से,
बर्जीलियस के शुद्ध कथन से ।

बनी यूरिया जब वोहलर से,
सभी कार्बनिक जन्म यहीं से ।

जान डाल्टन के गूँजे स्वर,
आंशिक दाब के योग बराबर ।

जय जय जय द्विचक्रवाहिनी,
मैकमिलन की भुजा दाहिनी ।

सिलने हेतु शक्ति के दाता,
एलियास हैं भाग्यविधाता ।

सत्य कहूँ यह सुन्दर वचना,
ल्यूवेन हुक की है यह रचना ।
कोटि सहस्र गुना सब दीखे,
सूक्ष्म बाल भी दण्ड सरीखे ।

देखहिं देखि कार्क के अन्दर,
खोज कोशिका है अति सुन्दर ।
काया की जिससे भयी रचना,
राबर्ट हुक का था यह सपना ।

टेलिस्कोप का नाम है प्यारा,
मुट्ठी में ब्रम्हाण्ड है सारा ।

गैलिलियो ने ऐसा जाना,
अविष्कार परम पुराना ।

विद्युत है चुम्बक की दाता,
सुंदर कथन मनहिं हर्षाता ।

पर चुम्बक से विद्युत आई,
ओर्स्टेड की कठिन कमाई ।

ओम नियम की कथा सुहाती,
धारा विभव है समानुपाती ।

एहि सन् उद्गगम करै विरोधा,
लेन्ज नियम अति परम प्रबोधा ।

चुम्बक विद्युत देखि प्रसंगा,
फैराडे मन उदित तरंगा ।

धारा उद्गगम फिरि मन मोहे,
मान निगेटिव फ्लक्स के होवे ।

जय जगदीश सबहिं को साजे,
वायरलेस अब हस्त बिराजै ।

अलेक्जेंडर फ्लेमिंग आए,
पेनिसिलिन से घाव भराये ।

आनुवांशिकी का यह दान,
कर लो मेण्डल का सम्मान ।

डाॅ रायंटजेन सुनहु प्रसंगा,
एक्स किरण की उज्ज्वल गंगा ।

मैक्स प्लांक के सुन्दर वचना,
क्वाण्टम अंक उन्हीं की रचना ।

फ्रैंकलिन की अजब कहानी,
देखि पतंग प्रकृति हरषानी ।

डार्विन ने यह रीति बनाई,
सरल जीव से सॄष्टि रचाई ।

परि प्रकाश फोटान जो धाये,
आइंस्टीन देखि हरषाए ।

षष्ठ भुजा में बेंजीन आई,
लगी केकुले को सुखदाई ।

देखि रेडियो मारकोनी का,
मन उमंग से भरा सभी का ।

कृत्रिम जीन का तोहफा लेके,
हरगोविंद खुराना आए ।

ऊर्जा की परमाणु इकाई,
डॉ. भाभा के मन भाई ।

थामस ग्राहम अति विख्याता,
गैसों के विसरण के ज्ञाता ।

जो यह पढ़े विज्ञान चालीसा,
देइ उसे विज्ञान आशीषा ।

अपने बच्चों को जरूर पढ़ायें
उपरोक्त चालीसा मे अविष्कार और अविष्कारक के नाम है

शिक्षा

शिक्षा
शिक्षा दायरे से बाहर सोचने का नाम है

लीक से हट कर सोचने से ही हम शिक्षा की परम्परागत व्यवस्था को बदल सकते है।

प्रेरक वीडियो अवश्य देखिये